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कितना परिपक्व हो गया है भारतीय प्रजातंत्र

भारतीय प्रजातंत्र ने इस 15 अगस्त 2018 को अपनी 72वीं वर्षगाँठ मनाई। लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज पहरा कर प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित किया और सफलताओं के साथ साथ देश के विकास की भावी योजनाओं पर भी चर्चा की।

👤 DAVINDER KUMAR DHAR1 Sep 2018 1:34 PM GMT
कितना परिपक्व हो गया है भारतीय प्रजातंत्र
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भारतीय प्रजातंत्र ने इस 15 अगस्त 2018 को अपनी 72वीं वर्षगाँठ मनाई। लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज पहरा कर प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित किया और सफलताओं के साथ साथ देश के विकास की भावी योजनाओं पर भी चर्चा की।

निःसंदेह भारतवर्ष विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है और 125 करोड लोग इसे मज़बूत कर रहे हैं। भारतीय संविधान के निर्माण मे बहुत से देशों के संविधान से मार्गदर्शन लिया है जिनमें ब्रिटेन, अमरिका और यूएसएसआर मुख्य है।

देश को चलाने के लिए हमारे संविधान में कार्यपालिका विधानपालिका और न्यायपालिका की भूमिका का विस्तृत वर्णन किया गया है।मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य, निर्देशक सिंद्धात हमें अपने अधिकारों और कर्तव्य के प्रति सचेत करते। इन की रक्षा और कर्तव्यपरायणता के लिए न्यायपालिका बराबर नज़र रखे हुए है। क़ानून बनाना और परिस्थियाँ के अनुरूप उन्हें संशोधित करने के लिए विधानपालिका के दायित्व भी संविधान में वर्णित हैं।विश्व के सबसे लंबे भारतीय संविधान में आज 448 अनुच्छेदों 25 भागों में विभक्त किया गया है और बाक़ी विवरण 12 अनुसुचियों में दिये गये जिन के माध्यम से संविधान को संशोधित किया गया है।

हमारी दृष्टि मे कई अुनच्छेद ऐसे हो जो अन्य अनुच्छेदों के अंतर्विरोध मे खड़े हो जाते है।यहाँ तक कि मौलिक अधिकारों का भी हनन हो जाता है।कुछ अधिकार और भी हैं जिन्हें संविधान का अंग बनना चाहिए वह है 'काम का अधिकार' क्या एक भारतीय को अपना जीवन यापन करने और सामान्य जीवन जीने का अधिकार संविधान में मौलिक अधिकारों में दे रखा है।

इसे निदेशक सिद्धांतों में तो जो रखा है लेकिन क़ानून के तहत यह लागू नहीं हैं और यह क़ानूनी वैधता के दायरे में नहीं आता।

कहना ना होगा की एक आदमी जो अपनी रोज़ी नहीं कमा सकता या बेरोज़गार है वह जीवन जीने योग्य जीवन जीने का अधिकार नहीं रखता।

आज़ादी के 71 वर्ष बीत जाने के बाबजूद भी देश की जनता भूखी है। क्या हमारा राष्ट्र सही मायने मे सार्वभौमिक कल्याणकारी राज्य हो गया है।संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का हनन कहाँ कहाँ कैसे कैस हो रहा है इसकी एक लंबी सूची है । हाँ कभी कभी न्यायपालिका हस्ताक्षेप कर के भटके हुए प्रजातंत्र को रास्ते पर लाने का प्रयास करती रहती है।

संविधान की परिकल्पना में यह स्पष्ट था कि सरकार के तीनों अंग अपना काम बिना किसी हस्ताक्षेप के मुक्त रूप से कार्य करते रहेंगे। ऐसे भी अवसर आये है जब क़ानून निर्माताओं ने अपने हित में राजनैतिक उद्देश्य की प्रतिपूर्ति के लिए व अपनी सत्ता का एकाधिकार वाद दिखाने के लिए क़ानून का दुरूपयोग किया है और क़ानून की व्याख्या अपने पक्ष में की है।

1977 का वह समय अभी भूला नहीं है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रिरा गांधी ने अपने हितों के संरक्षण के लिए हमारे इसी संविधान के अनुच्छेद के सहारा लेकर अध्यादेश जारी कर आपातकालीन स्थिति घोषित कर दी और नागरिकों के मौलिक अधिकारों निलंबित कर अपनी निरंकुशता स्थापित की।

तब शायद संविधान निर्माताओं ने सोचा भी नहीं होगा कि अध्यादेश का अभिप्राय ऐसा भी हो सकता है।

अगर हम समता के अधिकार की बात करें तो क्या हमारा प्रजातंत्र समान नागरिकों को विकास के समान अवसर दे रहा है।

आर्थिक संपन्नता और विपन्नता के चलते नागरिकों से भेदभाव स्वत: ही हो जाता संविधान निर्माताओं ने संविधान सभा बना कर देश के संविधान पर 26 नवंबर 1949 तक चर्चा कर इसे स्वीकार किया और 26 जनवरी 1950 से लागू कर दिया और आज तक लगभग 89 संशोधन कर दिये।

यहाँ तक की देश की राजभाषा हिन्दी को लेकर आज भी हमारे संविधान में संशय बना हुआ है ।राजभाषा अधिनियम 1963 में साफ़ कहा गया है देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी ही राजभाषा होगी। लेकिन हिन्दी के साथ अंग्रेज़ी का उपयोग जारी रहेगा।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 से कौन परिचित नहीं है जो जम्मू और कश्मीर को संविधान से भी उपर ला कर खडा कर देता ।

हमारे मौलिक कर्तव्य तो और भी जटिल बना दिया है। जिन्हें मूलत: यू एस एस आर के संविधान से लिया गया है।ननिर्देश सिद्धांतों को लागू करने केलिए न्यायालय के सहारे का कोई भी प्रावधान नहीं है।

क्या इन सवैधानिकअंतर्विरोधों के चलते हमारा प्रजातंत्र परिपक्व होता जा रहा है। यह प्रश्न सामान्य नागरिकों को आज भी उद्वेलित कर रहा है कि क्या संविधान में निहित नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य सुरक्षित हैं ,अगर हैं तो कितने ।

देवेंद्र धर शिमला

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